बर्बरीक से खाटू श्याम तक की गाथा
हारे का सहारा
महाभारत काल में भीम के पौत्र बर्बरीक एक अद्वितीय योद्धा थे। उन्होंने अपनी माता को वचन दिया था कि महाभारत युद्ध में जो भी पक्ष कमजोर पड़ेगा या हार रहा होगा, वह उसका साथ देंगे। यही कारण है कि आज उन्हें "हारे का सहारा" पुकारा जाता है।
शीश का परम दान
बर्बरीक के इस प्रण से धर्म की रक्षा हेतु भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण का रूप धर कर उनसे उनके शीश का दान मांग लिया। वीर बर्बरीक ने हंसते-हंसते अपना शीश काटकर प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया। इस महात्याग से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें कलयुग में स्वयं के 'श्याम' नाम से पूजे जाने का वरदान दिया।
खाटू धाम की स्थापना
महाभारत युद्ध समाप्ति के बाद बर्बरीक के शीश को खाटू नगर में दफनाया गया। माना जाता है कि कार्तिक माह की एकादशी को वहां अचानक गाय के थनों से दूध बहने लगा। खुदाई करने पर दिव्य शीश प्रकट हुआ, जिसे राजा रूपसिंह द्वारा भव्य मंदिर बनाकर स्थापित किया गया।



